Thursday, December 27, 2012

Hindi..27-12-2012

murli in Hindi..27-12-2012-मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - बाप को और चक्र को याद करो, मुख से कुछ भी बोलने की दरकार नहीं, सिर्फ इस
नर्क से दिल हटा दो तो तुम एवर निरोगी बन जायेंगे''

प्रश्न:- बाप डायरेक्ट आकर अपने बच्चों की श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने के लिए कौन सी राय देते हैं?
उत्तर:- बच्चे, अब तुम्हारा सब कुछ खत्म होने वाला है। कुछ भी काम नहीं आयेगा इसलिए सुदामे की तरह
अपनी भविष्य प्रालब्ध ब...ना लो। बाप डायरेक्ट आया है तो अपना सब कुछ सफल कर लो। हॉस्पिटल कम
कॉलेज खोल दो जिससे बहुतों का कल्याण हो। सबको रास्ता बताओ। श्रीमत पर सदा चलते रहो।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस अन्तिम जन्म में सम्पूर्ण पवित्र बन बाप की याद में ही रहना है। इस पतित दुनिया से दिल हटा देना है।

2) स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। हॉस्पिटल कम कॉलेज खोल अनेकों का कल्याण करना है। हर कदम पर
सुप्रीम सर्जन से श्रीमत लेनी है।

वरदान:- चारों ही सबजेक्ट को अपने स्वरूप में लाने वाले विश्व कल्याणकारी भव

पढ़ाई की जो चार सबजेक्ट हैं, उन सबका एक दो के साथ सम्बन्ध है। जो ज्ञानी तू आत्मा है, वह योगी तू
आत्मा भी अवश्य होगा और जिसने ज्ञान-योग को अपनी नेचर बना लिया उसके कर्म नेचुरल युक्तियुक्त वा
श्रेष्ठ होंगे। स्वभाव - संस्कार धारणा स्वरूप होंगे। जिनके पास इन तीनों सबजेक्ट की अनुभूतियों का खजाना है
वह मास्टर दाता अर्थात् सेवाधारी स्वत: बन जाते हैं। जो इन चारों सबजेक्ट में नम्बरवन लेते हैं उन्हें ही
कहा जाता है विश्व कल्याणकारी।

स्लोगन:- ज्ञान-योग को अपनी नेचर बनाओ तो कर्म नेचुरल श्रेष्ठ और युक्तियुक्त होंगे।

 

hindi 0f-26-12-2012-

muli in hindi 0f-26-12-2012-
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम्हें लौकिक अलौकिक परिवार से तोड़ निभाना है, लेकिन किसी में भी मोह नहीं रखना है, मोह जीत बनना है''

प्रश्न:- कयामत का यह समय है, इसलिए बाप की कौनसी श्रेष्ठ मत सबको सुनाते रहो?
उत्तर:- बाप की श्रेष्ठ मत सुनाओ कि कयामत के पहले अपने पापों का हिसाब-किताब चुक्तू कर लो। अपना भविष्य श्रेष्ठ बनाने के लिए बाप पर पूरा-पूरा बलिहार जाओ। ...कयामत के पहले ज्ञान और योग से मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा ले लो। सारा पुरुषार्थ अभी ही करना है। बाप पर सब कुछ बलिहार करेंगे तो 21 जन्म के लिए मिल जायेगा। बाप का बनकर हर कदम पर डायरेक्शन लेते रहो।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ड्रामा के पट्टे पर मजबूत रहना है। किसी भी बात में नाराज़ नहीं होना है। सदा राज़ी रहना है।
2) एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। धन्धा आदि करते भी बाप की याद में रहने का पुरुषार्थ करना है।
वरदान:- परमात्म प्यार में धरती की आकर्षण से ऊपर उड़ने वाले मायाप्रूफ भव.

परमात्म प्यार धरनी की आकर्षण से ऊपर उड़ने का साधन है। जो धरनी अर्थात् देह-अभिमान की आकर्षण से ऊपर रहते हैं उन्हें माया अपनी ओर खींच नहीं सकती। कितना भी कोई आकर्षित रूप हो लेकिन माया की आकर्षण आप उड़ती कला वालों के पास पहुंच नहीं सकती। जैसे राकेट धरनी की आकर्षण से परे हो जाता है। ऐसे आप भी परे हो जाओ, इसकी विधि है न्यारा बनना वा एक बाप के प्यार में समाये रहना-इससे मायाप्रूफ बन जायेंगे।

स्लोगन:- स्व स्थिति को ऐसा शक्तिशाली बनाओ जो परिस्थितियां उसे नीचे ऊपर न कर सकें।

 

Tuesday, December 25, 2012

06‐12‐12

06‐12‐12 रात:मरली ु ओम ्शाÛत ''बापदादा'' मधबनु
मरली ु सार:- ''मीठे बÍचे - तàहु Ʌ िशव जयिÛत का ×योहार बड़ी धमधाम ू से मनाना है। यह तàहार ु े िलए
बहुत बड़ा खशी ु का िदन है, सबको बाप का पिरचय देना है''
रæन:- कौन से बÍचे अपना बहुत बड़ा नकसान ु करते हɇ? घाटा कब पड़ता है?
उ×तर:- जो बÍचे चलत-ेचलते पढ़ाई छोड़ देते हɇ, वे अपना बहुत बड़ा नकसान ु करते हɇ। बाबा
रोज़ इतने हीरे र×न देते हɇ, गéयु Üवाइंटस सनात ु े हɇ, ...अगर कोई रेगलर ु नहीं सनतु े हɇतो घाटा
पड़ जाता है। नापास हो जाते हɇ, èवग् की ऊं ची बादशाही गवा ं देते हɇ। पद रçट हो जाता है।
गीत:- रात के राही थक मत जाना......
Video song: http://www.youtube.com/watch?v=qTmzjkAhtFw
धारणा के िलए म्यु सार:-
1) इस परानु े शरीर का Įगार ंृ नहीं करना है। वनवाह मɅ रह नये घर मɅ चलने की तयारी ै करनी
है।
2) ञान èनान रोज़ करना है। कभी भी पढ़ाई िमस नहीं करनी है।
वरदान:- सगमय ं गु पर सदा र×यष वा ताजा फल खाने वाले शि्तशाली वा तÛदǾèत भव
सगमय ं गु की ही िवशषता े हैजो एक की पदमगणा ु रािÜत होती हैऔर र×यषफल भी िमलता
है। अभी-अभी सेवा की और अभी-अभी खशी ु Ǿपी फल िमला। तो जो र×यषफल अथात् ्ताजा
रूट खाने वाले हɇवह शि्तशाली वा तÛदǾèत होते हɇ। कोई कमजोरी उनके पास आ नहीं
सकती। कमजोरी तब आती है जब अलबेले होकर कुàभकरण की नीदं मɅ सो जाते हो। अलट्
रहो तो सव् शि्तयां साथ रहɅगी और सदा तÛदǾèत रहɅगे।
èलोगन:- फालो एक रéमा बाप को करो बाकी सबसेगणु रहण करो।

[07-12-2012]

[07-12-2012]

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम्हें अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तुम जानते हो हर 5 हजार वर्ष बाद भोलानाथ बाप द्वारा हम यह ज्ञान सुनकर मनुष्य से देवता बनते हैं''
प्रश्न:- ज्ञान की धारणा न होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:- बुद्धि भटकती है, एक के साथ पूरा योग नहीं है। देही-अभिमानी नहीं बने हैं इसलिए धारणा नहीं होती है। बाबा कहते बच्चे, फैमिलियरटी में नहीं आओ। एक दो के नाम-रूप को म...त याद करो। एक बाप दूसरा न कोई - यह पाठ पक्का कर लो, दूसरों के पिछाड़ी न पड़ो। बाप से राय लेते रहो, इससे तुम दु:ख से लिबरेट हो जायेंगे। धारणा भी अच्छी होगी।
गीत:- भोलेनाथ से निराला....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप समान ज्ञान की शंख ध्वनि करनी है। सिर्फ पढ़ करके नहीं सुनाना है। धारणा करके फिर समझाना है।
2) खान-पान की बहुत परहेज रखनी है। श्रीमत का पालन कर प्रवृत्ति में रहते हुए कैसे पवित्र रहते हैं, यह अनुभव दूसरों को सुनाना है।
वरदान:- परमात्म प्यार और अधिकार की अलौकिक खुशी वा नशे में रहने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव
जो बच्चे बाप के साथ सदा कम्बाइन्ड रह, प्यार से कहते हैं 'मेरा बाबा' तो उन्हें परमात्म अधिकार प्राप्त हो जाता है। बेहद का दाता सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न कर देता है। तीनों लोकों के अधिकारी बन जाते हैं। फिर यही गीत गाते कि पाना था वह पा लिया, अभी कुछ पाने को नहीं रहा। उन्हें 21 जन्मों का गैरन्टी कार्ड मिल जाता है। तो इसी अलौकिक खुशी और नशे में रहो कि सब कुछ मिल गया।
स्लोगन:- साधनों के आधार पर साधना न हो। साधन, साधना में विघ्न रूप न बनें।

[08-12-2012]

[08-12-2012]

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - बेहद के बाप से तुम बहुत ऊंची पढ़ाई पढ़ रहे हो, बुद्धि में है पतित-पावन गॉड फादर के हम स्टूडेन्ट हैं, नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं''
प्रश्न:- रूहानी गवर्मेन्ट से इज़ाफ़ा किन बच्चों को मिलता है?
उत्तर:- जो बहुतों को आप समान बनाने की मेहनत करते हैं। सर्विस का सबूत निकालते हैं उन्हें रूहानी गवर्मेन्ट बहुत बड़ा इज़ाफ़ा देती है। वह भविष्य 21 जन्मों के लिए ऊंच पद के अ...धिकारी बनते हैं।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पढ़ाई का बहुत कदर रखना है। बाप से कृपा आदि नहीं मांगनी है। ज्ञान और योगबल जमा करना है।
2) रहमदिल बनना है। मुख से कभी कड़ुवे बोल नहीं बोलने हैं। सदा मीठा बोलना है। आप समान बनाने की सेवा जरूर करनी है।
वरदान:- कल्याणकारी समय की स्मृति से अपने भविष्य को जानने वाले मास्टर त्रिकालदर्शी भव
यदि आपसे कोई पूछे कि आपका भविष्य क्या है? तो बोलो हमको पता है-बहुत अच्छा है क्योंकि हम जानते हैं कि कल जो होगा वह बहुत अच्छा होगा। जो हो गया वो भी अच्छा, जो हो रहा है वह और अच्छा और जो होने वाला है वह और बहुत अच्छा। जो मास्टर त्रिकालदर्शी बच्चे हैं उन्हें निश्चय रहता कि कल्याणकारी समय है, बाप हमारा कल्याणकारी है और हम विश्व कल्याणकारी हैं तो हमारा अकल्याण हो नहीं सकता।
स्लोगन:- समाप्ति के समय को समीप लाना है तो सम्पूर्ण बनने का पुरूषार्थ करो।
 
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रिवाइज:15-10-75 मधुबन

09-12-12 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:15-10-75 मधुबन

आत्म-घाती महापापी न बनकर डबल अहिंसक बनने की युक्तियाँ

वरदान:- मालिकपन की स्मृति से शक्तियों को आर्डर प्रमाण चलाने वाले स्वराज्य अधिकारी भव
बाप द्वारा जो भी शक्तियाँ मिली हैं उन सर्व शक्तियों को कार्य में लगाओ। समय पर शक्तियों को यूज़ करो। सिर्फ मालिकपन की स्मृति में रहकर फिर आर्डर करो तो शक्तियां आपका आर्डर मानेंगी। अगर कमजोर होकर आर्डर करेंगे तो नहीं मानेंगी। बापदादा सभी बच्चों को मालिक बनाते हैं, कमजोर नहीं। सब बच्चे राजा बच्चे हैं क्योंकि स्वराज्य आपका बर्थ राइट है। यह बर्थ-राइट कोई भी छीन नहीं सकता।

स्लोगन:- त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहकर हर कर्म करो तो सफलता मिलती रहेगी।

10-12-12 Hindi:

Today Murli ( God's Word For Today ) - 10-12-12 Hindi:

मुरली सार:- "मीठे बच्चे - कोई कितना भी गुणवान हो, मीठा हो, धनवान हो तुम्हें उसकी तरफ आकर्षित नहीं होना है, जिस्म को याद नहीं करना है"

प्रश्न:- जिन बच्चों को नॉलेज मिली है उनके मुख से बाप के प्रति कौन से मीठे बोल निकलते हैं?
उत्तर:- ओहो! बाबा आपने तो हमें जीयदान दे दिया। मीठे बाबा आपने हमें सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज देकर, सर्व दु:खों स...े छुड़ा दिया तो कितनी शुक्रिया निकलनी चाहिए।

प्रश्न:- अन्त के समय बाप के सिवाए किसी में भी रग न जाए उसके लिए क्या करना है?
उत्तर:- बाबा कहे बच्चे - कोई भी चीज़ लोभ के वश अपने पास एक्स्ट्रा नहीं रखनी है। एक्स्ट्रा रखेंगे तो उसमें रग जायेगी। बाप की याद भूल जायेगी।

गीत:- धीरज धर मनुवा.....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान-योग से सबको मदद करनी है। डबल अहिंसक बनना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
2) नष्टोमोहा बनना है। किसी भी चीज़ में बुद्धि की रग नहीं रखनी है। एक बाप की याद सदा रहे- इसकी प्रैक्टिस करनी है।

वरदान:- श्रेष्ठ संस्कारों के आधार पर भविष्य संसार बनाने वाले धारणा स्वरूप भव
अभी के श्रेष्ठ संस्कारों से ही भविष्य संसार बनेगा। एक राज्य, एक धर्म के संस्कार ही भविष्य संसार का फाउण्डेशन हैं। स्वराज्य का धर्म वा धारणा है - मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क में सब प्रकार की पवित्रता। संकल्प वा स्वप्न मात्र भी अपवित्रता अर्थात् दूसरा धर्म न हो। जहाँ पवित्रता है वहाँ अपवित्रता अर्थात् व्यर्थ वा विकल्प का नामनिशान नहीं रहता, उन्हें ही धारणा स्वरूप कहा जाता है।

स्लोगन:- दृढ़ता की शक्ति कड़े संस्कारों को भी मोम की तरह पिघला देती है।

11-12-12 Hindi:

★ Today Murli ( God's Word For Today ) - 11-12-12 Hindi:

मुरली सार:- "मीठे बच्चे - दूरदेश से बाप आये हैं धर्म और राज्य दोनों की स्थापना करने, जब देवता धर्म है तो राजाई भी देवताओं की है, दूसरा धर्म वा राज्य नहीं"

प्रश्न:- सतयुग में सब पुण्य आत्मायें हैं, कोई पाप आत्मा नहीं, उसकी निशानी क्या है?
उत्तर:- वहाँ कोई कर्मभोग (बीमारी) आदि नहीं होता है। यहाँ बीमारियाँ आदि सिद्ध करती हैं कि आत्मायें पापों... की सज़ा कर्मभोग के रूप में भोग रही हैं, जिसे ही पास्ट का हिसाब-किताब कहा जाता है।

प्रश्न:- बाप के किस इशारे को दूरादेशी बच्चे ही समझ सकते हैं?
उत्तर:- बाप इशारा करते हैं - बच्चे तुम बुद्धियोग की दौड़ी लगाओ। यहाँ बैठे बाप को याद करो। प्यार से याद करेंगे तो तुम बाप के गले का हार बन जायेंगे। तुम्हारे प्रेम के ऑसू माला का दाना बन जाते हैं।

गीत:- आखिर वह दिन आया आज.....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) दूरादेशी बनना है। याद की यात्रा से विकर्मों का विनाश करना है। यात्रा पर कोई भी पाप कर्म नहीं करने हैं।
2) महावीर बन माया पर जीत पानी है। ग्लानि से डरना नहीं है, कलंगीधर बनना है।

वरदान:- तूफानों को उड़ती कला का तोहफा समझने वाले अखण्ड सुख-शान्ति सम्पन्न भव.
अखण्ड सुख-शान्तिमय, सम्पन्न जीवन का अनुभव करने के लिए स्वराज्य अधिकारी बनो। स्वराज्य अधिकारी के लिए तूफान अनुभवी बनाने वाले उड़ती कला का तोहफ़ा बन जाते हैं। उन्हें साधन, सैलवेशन वा प्रश्नंसा के आधार पर सुख की अनुभूति नहीं होती लेकिन परमात्म प्राप्ति के आधार पर अखण्ड सुख-शान्ति का अनुभव करते हैं। किसी भी प्रकार की अशान्त करने वाली परिस्थितियां उनकी अखण्ड शान्ति को खण्डित नहीं कर सकती।

स्लोगन:- सदा भरपूरता का अनुभव करना है तो दुआयें दो और दुआयें लो

13-12-2012-in Hindi.

Essence of murli of 13-12-2012-in Hindi.
मुरली सार:- "मीठे बच्चे - योगेश्वर बाप आये हैं तुम्हें राजयोग सिखलाने, इस योग से ही तुम विकर्माजीत बन भविष्य में विश्व महाराजा-महारानी बनते हो"

प्रश्न:- विकर्मों से बचने के लिए कौन सी प्रतिज्ञा याद रखो?
उत्तर:- मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। एक बाप से सच्चा रूहानी लव रखना है। यह प्रतिज्ञा याद रहे तो विकर्म नहीं होगा। माया देह-अभिमान में लाकर उल्टा कर्म ...कराती है। बाबा उस्ताद है, उसे याद कर माया से पूरी युद्ध करो तो हार नहीं हो सकती।

प्रश्न:- बाप को अपने बच्चों प्रति कौन सी आश है?
उत्तर:- जैसे लौकिक बाप चाहते हैं मैं बच्चों को ऊंच पढ़ाऊं, बेहद का बाप भी कहते हैं मैं अपने बच्चों को स्वर्ग की परी बना दूँ। बच्चे सिर्फ मेरी श्रीमत पर चले तो श्रेष्ठ बन जायें।

गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ......

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कोई भी भूत अन्दर प्रवेश न हो, इसकी सम्भाल रखनी है। कभी भी माया के तूफानों में मूँझना नहीं है। खराब आदतें निकाल देनी है।
2) याद का चार्ट रखना है, साथ-साथ रूहानी सेवाधारी बन रूहों को ज्ञान का इन्जेक्शन लगाना है।

वरदान:- परमात्म चिंतन के आधार पर सदा बेफिक्र रहने वाले निश्चयबुद्धि, निश्चिंत भव.

दुनिया वालों को हर कदम में चिंता है और आप बच्चों के हर संकल्प में परमात्म चिंतन है, इसलिए बेफिक्र हो। करावनहार करा रहा है आप निमित्त बन करने वाले हो, सर्व के सहयोग की अंगुली है इसलिए हर कार्य सहज और सफल हो रहा है, सब ठीक चल रहा है और चलना ही है। कराने वाला करा रहा है हमें सिर्फ निमित्त बन तन-मन-धन सफल करना है। यही है बेफिक्र, निश्चिंत स्थिति।

स्लोगन:- सदा सन्तुष्टता का अनुभव करना है तो सबकी दुआयें लेते रहो।

Hindi.मुरली सार

Hindi.मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - इस पढ़ाई में आवाज की आवश्यकता नहीं - यहाँ तो बाप ने एक ही मन्त्र दिया है कि बच्चे चुप रहकर मुझे याद करो''

प्रश्न:- जिन बच्चों को ईश्वरीय नशा रहता है उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:- ईश्वरीय नशे में रहने वाले बच्चों की चलन बड़ी रॉयल होगी। 2. मुख से बहुत कम बोलेंगे। 3- उनके मुख से सदैव रत्न ही निकलेंगे। वैसे भी रॉयल मनुष्य बहुत थोड़ा बोलते हैं। तुम ...तो ईश्वरीय सन्तान हो, तुम्हें रॉयल्टी में रहना है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपने को सदा रिफ्रेश रखना है। मुख से रत्न ही निकालने हैं। कभी उदासी आदि आये तो बाबा के बनवाये हुए गीत सुनने हैं।
2) देही-अभिमानी बनने की प्रैक्टिस करनी है। याद में रह खाद निकालने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:- ज्ञान खजाने द्वारा मुक्ति-जीवनमुक्ति का अनुभव करने वाले सर्व बंधनमुक्त भव.

ज्ञान रत्नों का खजाना सबसे श्रेष्ठ खजाना है, इस खजाने द्वारा इस समय ही मुक्ति-जीवनमुक्ति की अनुभूति कर सकते हो। ज्ञानी तू आत्मा वह है जो दु:ख और अशान्ति के सब कारण समाप्त कर, अनेकानेक बन्धनों की रस्सियों को काटकर मुक्ति वा जीवनमुक्ति का अनुभव करे। अनेक व्यर्थ संकल्पों से, विकल्पों से और विकर्मो से सदा मुक्त रहना-यही मुक्त और जीवनमुक्त अवस्था है।

स्लोगन:- विश्व परिवर्तक वह है जो अपनी शक्तिशाली वृत्तियों से वायुमण्डल को परिवर्तन कर दे।

hindi-16-12-12

essence of murli in hindi-16-12-12 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज:09-01-96 मधुबन
''बालक सो मालिकपन के नशे में रहने के लिए मन का राजा बनो''

वरदान:- दुआओं के राकेट द्वारा तीव्रगति से उड़ने वाले विघ्न प्रूफ भव.

मात-पिता और सर्व के संबंध में आते हुए दुआओं के खजाने से स्वयं को सम्पन्न करो तो कभी भी पुरूषार्थ में मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। जैसे साइन्स में सबसे तीव्रगति राकेट की होती है ऐसे संगमयुग पर सबसे तीव्रगति से आगे उड़ने का यन्त्र अथवा उससे भी श्रेष्ठ राकेट ''सबकी दुआयें'' हैं, जिसे कोई भी विघ्न जरा भी स्पर्श नहीं कर सकता, इससे विघ्न प्रूफ बन जायेंगे, युद्ध नहीं करनी पड़ेगी।

स्लोगन:- परोपकार की भावना से सम्पन्न बनना ही श्रेष्ठता का आधार है।

सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है

om shanti.
सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है
सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है

प्राय: लोग यह नारा तो लगते है कि “हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी आपस में भाई-भाई है”, परन्तु वे सभी आपस में भाई-भाई कैसे है और यदि वे भाई-...भाई है तो उन सभी का एक पिता कौन है- इसे वे नहीं जानते | देह की दृष्टि से तो वे सभी भाई-भाई हो नहीं सकते क्योंकि उनके माता-पिता अलग-अलग है, आत्मिक दृष्टि से ही वे सभी एक परमपिता परमात्मा की सन्तान होने के नाते से भाई-भाई है | यहाँ सभी आत्माओं के एक परमपिता का परिचय दिया गया है | इस स्मृति में स्थित होने से राष्ट्रीय एकता हो सकती है |प्राय: सभी धर्मो के लोग कहते है कि परमात्मा एक है और सभी का पिता है और सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई है | परन्तु प्रश्न उठता है कि वह एक पारलौकिक परमपिता कौन है जिसे सभी मानते है ? आप देखगें कि भले ही हर एक धर्म के स्थापक अलग-अलग है परन्तु हर एक धर्म के अनुयायी निराकार, ज्योति-स्वरूप परमात्मा शिव की प्रतिमा (शिवलिंग) को किसी-न-किसी प्रकार से मान्यता देते है | भारतवर्ष में तो स्थान-स्थान पर परमपिता परमात्मा शिव के मंदिर है ही और भक्त-जन ‘ओम् नमों शिवाय’ तथा ‘तुम्हीं हो माता तुम्हीं पिता हो’ इत्यादि शब्दों से उसका गायन व पूजन भी करते है और शिव को श्रीकृष्ण तथा श्री राम इत्यादि देवों के भी देव अर्थात परमपूज्य मानते ही है परन्तु भारत से बाहर, दूसरे धर्मों के लोग भी इसको मान्यता देते है | यहाँ सामने दिये चित्र में दिखाया गया है कि शिव का स्मृति-चिन्ह सभी धर्मों में है |अमरनाथ, विश्वनाथ, सोमनाथ और पशुपतिनाथ इत्यादि मंदिरों में परमपिता परमात्मा शिव ही के स्मरण चिन्ह है | ‘गोपेश्वर’ तथा ‘रामेश्वर’ के जो मंदिर है उनसे स्पष्ट है कि ‘शिव’ श्री कृष्ण तथा श्री राम के भी पूज्य है | रजा विक्रमादित्य भी शिव ही की पूजा करते थे | मुसलमानों के मुख्य तीर्थ मक्का में भी एक इसी आकार का पत्थर है जिसे कि सभी मुसलमान यात्री बड़े प्यार व सम्मान से चूमते है | उसे वे ‘संगे-असवद’ कहते है और इब्राहिम तथा मुहम्मद द्वारा उनकी स्थापना हुई मानते है | परन्तु आज वे भी इस रहस्य को नहीं जानते कि उनके धर्म में बुतपरस्ती (प्रतिमा पूजा) की मान्यता न होते हुए भी इस आकार वाले पत्थर की स्थपना क्यों की गई है और उनके यहाँ इसे प्यार व सम्मान से चूमने की प्रथा क्यों चली आती है ? इटली में कई रोमन कैथोलिक्स ईसाई भी इसी प्रकार वाली प्रतिमा को ढंग से पूजते है | ईसाइयों के धर्म-स्थापक ईसा ने तथा सिक्खों के धर्म स्थापक नानक जी ने भी परमात्मा को एक निराकार ज्योति (Kindly Light) ही माना है | यहूदी लोग तो परमात्मा को ‘जेहोवा’ (Jehovah) नाम से पुकार्तेहाई जो नाम शिव (Shiva) का ही रूपान्तर मालूम होता है | जापान में भी बौद्ध-धर्म के कई अनुयायी इसी प्रकार की एक प्रतिमा अपने सामने रखकर उस पर अपना मन एकाग्र करते है |परन्तु समयान्तर में सभी धर्मों के लोग यह मूल बात भूल गये है कि शिवलिंग सभी मनुष्यात्माओं के परमपिता का स्मरण-चिन्ह है | यदि मुसलमान यह बात जानते होते तो वे सोमनाथ के मंदिर को कभी न लूटते, बल्कि मुसलमान, ईसाई इत्यादि सभी धर्मों के अनुयायी भारत को ही परमपिता परमात्मा की अवतार-भूमि मानकर इसे अपना सबसे मुख्य तीर्थ मानते और इस प्रकार संसार का इतिहास ही कुछ और होता | परन्तु एक पिता को भूलने के कारण संसार में लड़ाई-झगड़ा दुःख तथा क्लेश हुआ और सभी अनाथ व कंगाल बन गये |See More

निराकार परम पिता परमात्मा और उनके दिव्य गुण...

निराकार परम पिता परमात्मा और उनके दिव्य गुण
निराकार परम पिता परमात्मा और उनके दिव्य गुण



निराकार परम पिता परमात्मा और उनके दिव्य गुणप्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को ‘हे पिता’, ‘हे दुखहर्ता और सुखकर्ता प्रभु’, (O! Heavenly God-Father) इत्यादि... सम्बन्ध-सूचको शब्दों से याद करते है | परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिसे वे ‘पिता’ कहकर पुकारते है उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नहीं है और उसके साथ उनका अच्छी रीती स्नेह और सम्बन्ध भी नहीं है | परिचय और स्नेह न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नहीं टिकता | इसलिए, उन्हें परमपिता परमात्मा से शान्ति तथा सुख का जो जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नहीं होता | वे न तो परमपिता परमात्मा के मधुर मिलन का सच्चा सुख अनुभव कर सकते है, न उससे लाईट (light प्रकाश) और माईट (Might शक्ति) ही प्राप्त कर सकते है और न ही उनके संस्कारों तथा जीवन में कोई विशेष परिवर्तन ही आ पाता है | इसलिए हम यहाँ उस परम प्यारे परमपिता परमात्मा का संक्षिप्त परिचय दे रहे है जो कि स्वयं उन्होंने ही लोक-कल्याणार्थ हमे समझाया है और अनुभव कराया है और अब भी करा रहे है |परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमापरमपिता परमात्मा का नाम ‘शिव’ है | ‘शिव’ का अर्थ ‘कल्याणकारी’ है | परमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द ए सागर और प्रेम के सागर है | वह ही पतितों को पावन करने वाले, मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की राह दिखाने वाले (Guide), विकारों तथा काल के बन्धन से छुड़ाने वाले (Libberator) और सब प्राणियों पर रहम करने वाले (Merciful) है | मनुष्य मात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सद्गति का वरदान देने वाले भी एक-मात्र वही है | वह दिव्य-बुद्धि के डाटा और दिव्य-दृष्टी के वरदाता भी है | मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने तथा अमरपद का वरदान देने के कारण ‘सोमनाथ’ तथा ‘अमरनाथ’ इत्यादि नाम भी उन्ही के है | वह जन्म-मरण से सदा मुक्त, सदा एकरस, सदा जगती ज्योति, ‘सदा शिव’ है |परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूपपरमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक ‘ज्योति बिन्दु’ के समान, दीये की लौ जैसा है | वह रूप अतिनिर्मल, स्वर्णमय लाल (Golden Red) और मन-मोहक है | उस दिव्य ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षु द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य-बुद्धि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है | परमपिता परमात्मा के उस ‘ज्योति-बिन्दु’ रूप की प्रतिमाएं भारत में ‘शिव-लिंग’ नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में ‘महा शिवरात्रि’ भी मनाई जाती है |‘निराकार’ का अर्थलगभग सभी धर्मों के अनुयायी परमात्मा को ‘निराकार’ (Incorporeal) मानते है | परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है कि परमात्मा का कोई भी आकार (रूप) नहीं है | अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है | वास्तव में ‘निराकार’ का अर्थ है कि परमपिता ‘साकार’ नहीं है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल-शारीरिक आकार है और न देवताओं-जैसा सूक्ष्म शारीरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिन्दु के समान है | ‘बिन्दु’ को तो ‘निराकार’ ही कहेंगे | अत: यह एक आश्चर्य जनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सूक्ष्मतिसूक्ष्म, एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में है |See More

आत्मा क्या है और मन क्या है ?

आत्मा क्या है और मन क्या है ?
आत्मा क्या है और मन क्या है ?



आत्मा क्या है और मन क्या है ?अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार ‘ मैं ’ शब्द का प्रयोग करता है | परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन ‘ मैं ’ और ...‘ मेरा ’ शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि ‘ मैं ’ कहने वाले सत्ता का स्वरूप क्या है, अर्थात ‘ मैं’ शब्द जिस वस्तु का सूचक है, वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजें तो बना डाली है, उसने संसार की अनेक पहेलियों का उत्तर भी जान लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओं का हल ढूंढ निकलने में खूब लगा हुआ है, परन्तु ‘ मैं ’ कहने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता | आज किसी मनुष्य से पूछा जाये कि- “आप कौन है ?” तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो धंधा वह करता है वह उसका नाम बता देगा |वास्तव में ‘मैं’ शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता ‘आत्मा’ का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है | मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिला कर बनता है | जैसे शरीर पाँच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन, बुद्धि और संस्कारमय होती है | आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है |आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिन्दु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है | जैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिन्दु-सा दिखाई देता है, वैसे ही दिव्य-दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही दिखाई देती है | इसीलिए एक प्रसिद्ध पद में कहा गया है- “भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा, गरीबां नूं साहिबा लगदा ए प्यारा |” आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यही हाथ लगता है | जब वह यश कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है, तब भी वह यही हाथ लगता है | आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगों में यहाँ ही बिन्दी अथवा तिलक लगाने की प्रथा है | यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिष्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध सरे शरीर में फैले ज्ञान-तन्तुओं से है | आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिष्क तथा तन्तुओं द्वारा व्यक्त होता है | आत्मा ही शान्ति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है | अत: मन और बुद्धि आत्म से अलग नहीं है | परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह- स्त्री, पुरुष, बूढ़ा जवान इत्यादि मान बैठी है | यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है |उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है | शरीर मोटर के समान है तथा आत्मा इसका ड्राईवर है, अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियंत्रण करती है | आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है, जैसे ड्राईवर के बिना मोटर | अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य (गन्तव्य स्थान) पर पहुंच सकता है | अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कार चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (Accident) का शिकार बन जाता है और कार उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नहीं है वह स्वयं तो दुखी और अशान्त होता ही है, साथ में अपने सम्पर्क में आने वाले मित्र-सम्बन्धियों को भी दुखी व अशान्त बना देता है | अत: सच्चे सुख व सच्ची शान्ति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है |+ तीन लोक कौन से है और शिव का धाम कौन सा है

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है...

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है
मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है ?मनुष्य का वर्तमान जीवन बड़ा अनमोल है क्योंकि अब संगमयुग में ही वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करके जन्म-जन्मान्तर के लिए सर्वोत्तम प्रारब्ध बना सकता है और अतुल हीरो-तुल्य कमाई कर सकता ह...ै I वह इसी जन्म में सृष्टि का मालिक अथवा जगतजीत बनने का पुरुषार्थ कर सकता है I परन्तु आज मनुष्य को जीवन का लक्ष्य मालूम न होने के कारण वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करने की बजाय इसे विषय-विकारो में गँवा रहा है I अथवा अल्पकाल की प्राप्ति में लगा रहा है I आज वह लौकिक शिक्षा द्वारा वकील, डाक्टर,इंजिनीयर बनने का पुरुषार्थ कर रहा है और कोई तो राजनीति में भाग लेकर देश का नेता, मंत्री अथवा प्रधानमंत्री बनने के प्रयत्न में लगा हुआ है अन्य कोई इन सभी का सन्यास करके, "सन्यासी" बनकर रहना चाहता है I परन्तु सभी जानते है की म्रत्यु-लोक में तो राजा-रानी, नेता वकील, इंजीनियर, डाक्टर, सन्यासी इत्यादि कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है I सभी को तन का रोग, मन की अशांति, धन की कमी, जानता की चिंता या प्रकृति के द्वारा कोई पीड़ा, कुछ न कुछ तो दुःख लगा ही हुआ है I अत: इनकी प्राप्ति से मनुष्य जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि मनुष्य तो सम्पूर्ण - पवित्रता, सदा सुख और स्थाई शांति चाहता है Iचित्र में अंकित किया गया है कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य जीवन-मुक्ति की प्राप्ति अठेया वैकुण्ठ में सम्पूर्ण सुख-शांति-संपन्न श्री नारायण या श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति ही है I क्योंकि वैकुण्ठ के देवता तो अमर मने गए है, उनकी अकाल म्रत्यु नही होती; उनकी काया सदा निरोगी रहती है I और उनके खजाने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होती इसीलिए तो मनुष्य स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ को याद करते है और जब उनका कोई प्रिय सम्बन्धी शरीर छोड़ता है तो वह कहते है कि -" वह स्वर्ग सिधार गया है " Iइस पद की प्राप्ति स्वयं परमात्मा ही ईश्वरीय विद्या द्वारा कराते हैइस लक्ष्य की प्राप्ति कोई मनुष्य अर्थात कोई साधू-सन्यासी, गुरु या जगतगुरु नहीं करा सकता बल्कि यह दो ताजो वाला देव-पद अथवा राजा-रानी पद तो ज्ञान के सागर परमपिता परमात्मा शिव ही से प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ईश्वरीय ज्ञान तथा सहज राजयोग के अभ्यास से प्राप्त होता है Iअत: जबकि परमपिता परमात्मा शिव ने इस सर्वोत्तम ईश्वरीय विद्या की शिक्षा देने के लिए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विद्यालय की स्थापना की है I तो सभी नर-नारियो को चाहिए की अपने घर-गृहस्थ में रहते हुए, अपना कार्य धंधा करते हुए, प्रतिदिन एक-दो- घंटे निकलकर अपने भावी जन्म-जन्मान्तर के कल्याण के लिए इस सर्वोत्तम तथा सहज शिक्षा को प्राप्त करे I

इस विद्या की प्राप्ति के लिए कुछ भी खर्च करने की आवश्यकता नही है, इसीलिए इसे तो निर्धन व्यक्ति भी प्राप्त कर अपना सौभाग्य बना सकते है I इस विद्या को तो कन्याओ, मतों, वृद्ध-पुरुषो, छोटे बच्चो और अन्य सभी को प्राप्त करने का अधिकार है क्योंकि आत्मा की दृष्टी से तो सभी परमपिता परमात्मा की संतान है I
अभी नहीं तो कभी नहींवर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है I इसलिय अब यह पुरुषार्थ न किया तो फिर यह कभी न हो सकेगा क्योंकि स्वयं ज्ञान सागर परमात्मा द्वारा दिया हुआ यह मूल गीता - ज्ञान कल्प में एक ही बार इस कल्याणकारी संगम युग में ही प्राप्त हो सकता है I
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17-12-12 Hindi:

★ Today Murli ( God's Word For Today ) - 17-12-12 Hindi:

मीठे बच्चे - यह सारी दुनिया रोगियों की बड़ी हॉस्पिटल है, बाबा आये हैं सारी दुनिया को निरोगी बनाने''

प्रश्न:- कौन-सी स्मृति रहे तो कभी भी मुरझाइस वा दुःख की लहर नहीं आ सकती है?
उत्तरः- अभी हम इस पुरानी दुनिया, पुराने शरीर को छोड़ घर में जायेंगे फिर नई दुनिया में पुनर्जन्म लेंगे। हम अभी राजयोग सीख रहे हैं - राजाई में जाने के लिए। बाप हम बच्चों... के लिए रूहानी राजस्थान स्थापन कर रहे हैं, य
ही स्मृति रहे तो दुःख की लहर नहीं आ सकती।

गीतः- तुम्हीं हो माता.....

धारणा के लिए मुख्य सारः-
1) जैसे बाप सदैव आत्म-अभिमानी हैं, ऐसे आत्म-अभिमानी रहने का पूरा-पूरा पुरूषार्थ करना है। एक बाप को दिल से प्यार करते-करते बाप के साथ घर चलना है।
2) बेहद के बाप का पूरा-पूरा रिगार्ड रखना है अर्थात् बाप के फरमान पर चलना है। बाप का पहला फरमान है - बच्चे अच्छी रीति पढ़कर पास हो जाओ। इस फरमान को पालन करना है।

वरदानः- विजयीपन के नशे द्वारा सदा हर्षित रहने वाले सर्व आकर्षणों से मुक्त भव
विजयी रत्नों का यादगार - बाप के गले का हार आज तक पूजा जाता है। तो सदा यही नशा रहे कि हम बाबा के गले का हार विजयी रत्न हैं, हम विश्च के मालिक के बालक हैं। हमें जो मिला है वह किसी को भी मिल नहीं सकता-यह नशा और खुशी स्थाई रहे तो किसी भी प्रकार की आकर्षण से परे रहेंगे। जो सदा विजयी हैं वो सदा हर्षित हैं। एक बाप की याद के ही आकर्षण में आकर्षित हैं।

स्लोगनः- एक के अन्त में खो जाना अर्थात् एकान्तवासी बनना।
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[18-12-2012]

[18-12-2012]

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - 3 बाप का राज़ सबको कहानी मिसल सुनाओ, जब तक बेहद बाप को पहचानकर पावन नहीं बने हैं तब तक वर्सा मिल नही सकता''
प्रश्न:- बाबा बिल्कुल ही नया है, उसने तुमको अपना कौन सा नया परिचय दिया है?
उत्तर:- बाबा को मनुष्यों ने हजारों सूर्य से तेजोमय कहा लेकिन बाबा कहता मैं तो बिन्दी हूँ। तो नया बाबा हुआ ना। पहले अगर बिन्दी का साक्षात्कार होता तो कोई मानता ही नहीं इसलिए जैसी... जिसकी भावना होती है उन्हें वैसा ही साक्षात्कार हो जाता है।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) योगबल से आत्मा को सतोप्रधान बनाकर एकरस कर्मातीत अवस्था तक पहुँचना है। याद की गुप्त मेहनत करनी है, एकान्त में पढ़ाई करनी है।
2) बाप से मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा लेने के लिए इस अन्तिम जन्म में पवित्र जरूर बनना है।
वरदान:- बाप की छत्रछाया के नीचे सदा सेफ्टी का अनुभव करने वाले सर्व आकर्षण मुक्त भव
जैसे स्थूल दुनिया में धूप वा बारिश से बचने के लिए छत्रछाया का आधार लेते हैं, वह है स्थूल छत्रछाया और यह है बाप की छत्रछाया, जो आत्मा को हर समय सेफ रखती है। उसे कोई भी आकर्षण अपनी ओर आकर्षित कर नहीं सकती। दिल से बाबा कहा और सेफ। चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए-छत्रछाया के अन्दर रहने वाले सदा सेफ्टी का अनुभव करते हैं। माया के प्रभाव का सेक-मात्र भी नहीं आ सकता।
स्लोगन:- ऐसे स्व-राज्य अधिकारी बनो जो अधीनता समाप्त हो जाए

[19-12-2012]

[19-12-2012]

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम्हें अच्छे संस्कार धारण कर पतितों को पावन बनाने की सर्विस करनी है, अंधों की लाठी बनना है''
प्रश्न:- पिछाड़ी के समय कौन सी अवस्था आनी है?
उत्तर:- पिछाड़ी के समय निरन्तर रूहानी यात्रा करते रहेंगे। बैठे-बैठे साक्षात्कार होंगे। बाप और वर्सा याद आता रहेगा। वैकुण्ठ देखते रहेंगे, बस अभी हम यह प्रालब्ध पायेंगे। हर्षित होते रहेंगे। परन्तु अच्छा पुरुषार्थ नहीं किय...ा तो पछताना भी होगा। सज़ाओं का भी साक्षात्कार करेंगे।
गीत:- रात के राही...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूहानी यात्रा पर रहने के लिए एक दो को सावधान करते रहना है। कर्मातीत अवस्था में जाने के लिए सारा दिन याद में रहने की मेहनत करनी है।
2) कोई भी उल्टी चलन नहीं चलनी है। सबको सुखधाम का रास्ता बताना है। सर्विस का शौक रखना है।
वरदान:- सन्तुष्टता के आधार पर दुआयें देने और लेने वाले सहज पुरूषार्थी भव
सर्व की दुआयें उन्हें मिलती हैं जो स्वयं सन्तुष्ट रहकर सबको सन्तुष्ट करते हैं। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ दुआयें हैं। यदि सर्व गुण धारण करने वा सर्व शक्तियों को कन्ट्रोल करने में मेहनत लगती हो, तो उसे भी छोड़ दो, सिर्फ अमृतवेले से लेकर रात तक दुआयें देने और दुआयें लेने का एक ही कार्य करो तो इसमें सब कुछ आ जायेगा। कोई दु:ख भी दे तो भी आप दुआयें दो तो सहज पुरूषार्थी बन जायेंगे।
स्लोगन:- जो समर्पित स्थिति में रहते हैं उनके आगे सर्व का सहयोग स्वत: समर्पित हो जाता है।
 

22-12-12 Hindi:



Today Murli ( God's Word For Today ) - 22-12-12 Hindi:

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - बाप भल यहाँ तुम्हारे सम्मुख है लेकिन याद तुम्हें शान्तिधाम घर में करना है - तुम्हारा बुद्धियोग सदा ऊपर लटका रहे''

प्रश्न:- अहो भाग्य किन बच्चों का कहेंगे और क्यों?
उत्तर:- जिन बच्चों की बुद्धि में बाप की नॉलेज आई, उनका है अहो भाग्य क्योंकि ज्ञान मिलने से सद्गति हो जाती है। तुम विश्व के मालिक बन जाते हो। बाकी जब तक ...ज्ञान नहीं है तब तक कोई शिवबाबा पर शरीर भी होम दे लेकिन प्राप्ति सिर्फ अल्पकाल की होती है। बाप का वर्सा नहीं मिलता है। भक्ति में भावना के चने मिल जाते हैं, सद्गति नहीं मिलती।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) घर-घर को मन्दिर बनाना है। परिवार वालों की भी सेवा करनी है। ऊंचे ज्ञान का सिमरण कर खुशी से झोली भरनी है।
2) किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है। अपना बुद्धियोग ऊपर लटकाना है। सुहावने संगमयुग पर जीते जी पारलौकिक बाप का बनना है।

वरदान:- अल्पकाल के सहारे के किनारों को छोड़ बाप को सहारा बनाने वाले यथार्थ पुरूषार्थी भव
अल्पकाल के आधारों का सहारा, जिसको किनारा बनाकर रखा है। यह अल्पकाल के सहारे के किनारे अभी छोड़ दो। जब तक ये किनारे हैं तो सदा बाप का सहारा अनुभव नहीं हो सकता और बाप का सहारा नहीं है इसलिए हद के किनारों को सहारा बना लेते हो। अल्पकाल की बातें धोखेबाज हैं, इसलिए समय की तीव्रगति को देख अब इन किनारों से तीव्र उड़ान कर सेकण्ड में क्रॉस करो-तब कहेंगे यथार्थ पुरूषार्थी।

स्लोगन:- कर्म और योग का बैलेन्स रखना ही सफल कर्मयोगी बनना है।

23-12-12 Hindi:

Today Murli ( God's Word For Today ) - 23-12-12 Hindi:

प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:16-10-75 मधुबन

संकल्प शक्ति को कंट्रोल कर सिद्धि-स्वरुप बनने की युक्तियाँ

वरदान:- एक बाप की याद द्वारा एकरस स्थिति का अनुभव करने वाले सार स्वरूप भव.

एकरस स्थिति में रहने की सहज विधि है एक की याद। एक बाबा दूसरा न कोई। जैसे बीज में सब कुछ समाया हुआ होता है। ऐसे बाप भी बीज है, जिसमें सर्व सम...्बन्धों का, सर्व प्राप्तियों का सार समाया हुआ है। एक बाप को याद करना अर्थात् सार स्वरूप बनना। तो एक बाप, दूसरा न कोई-यह एक की याद एकरस स्थिति बनाती है। जो एक सुखदाता बाप की याद में रहते हैं उनके पास दु:ख की लहर कभी आ नहीं सकती। उन्हें स्वप्न भी सुख के, खुशी के, सेवा के और मिलन मनाने के आते हैं।

स्लोगन:- श्रेष्ठ आशाओं का दीपक जगाने वाले ही सच्चे कुल दीपक हैं।

‎25-12-12:

‎25-12-12:

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - सदा यह स्मृति में रहे कि हमारा यह अन्तिम 84 वाँ जन्म है, अब वापिस घर जाना है, फिर अपने राज्य में आना है''
प्रश्न:- बाप पक्का सौदागर है, कैसे?

... उत्तर:- जो अभी साहूकार हैं, जिन्हें पैसे का नशा है, बाबा कहते हैं, तुम यहाँ की अपनी राजाई सम्भालो। उनका बाप स्वीकार नहीं करता है। गरीबों को ही बाबा ऊंच ते ऊंच बनाते हैं। गरीबों की पाई-पाई सफल कर उन्हें साहूकार बना देते इसलिए बाप को पक्का सौदागर कहा जाता है।

प्रश्न:- बच्चों में कौन सी सुस्ती बिल्कुल नहीं होनी चाहिए?

उत्तर:- कई बच्चे मुरली सुनने वा पढ़ने में सुस्ती करते हैं। मुरली मिस कर देते हैं। बाबा कहते हैं बच्चे इसमें सुस्त मत बनो। तुम्हें एक भी मुरली मिस नहीं करनी है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सभी को राज़ी करना है। मूडी दिमाग वाला नहीं बनना है। बहुत-बहुत मीठा बनना है। अच्छे मैनर्स सीखने और सिखलाने हैं।
2) हर कदम पर सुप्रीम सर्जन से राय लेनी है। श्रीमत पर चलते रहना है। सेन्सीबुल बन हर प्वाइंटस स्वयं में धारण करनी है।

वरदान:- मन-बुद्धि-संस्कार वा सर्व कर्मेन्द्रियों को नीति प्रमाण चलाने वाले स्वराज्य अधिकारी भव

स्वराज्य अधिकारी आत्मायें अपने योग की शक्ति द्वारा हर कर्मेन्द्रिय को ऑर्डर के अन्दर चलाती हैं। न सिर्फ यह स्थूल कर्मेन्द्रियां लेकिन मन-बुद्धि-संस्कार भी राज्य अधिकारी के डायरेक्शन अथवा नीति प्रमाण चलते हैं। वे कभी संस्कारों के वश नहीं होते लेकिन संस्कारों को अपने वश में कर श्रेष्ठ नीति से कार्य में लगाते हैं, श्रेष्ठ संस्कार प्रमाण सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं। स्वराज्य अधिकारी आत्मा को स्वप्न में भी धोखा नहीं मिल सकता।

स्लोगन:- निर्माणता की विशेषता को धारण कर लो तो सफलता मिलती रहेगी।

Wednesday, December 5, 2012

Hindi 05-12-12 : 05-12-12

Today Murli ( God's Word For Today ) - 05-12-12 Hindi:

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तुम त्रिकालदर्शी बने हो लेकिन यह अलंकार अभी तुम्हें नहीं दे सकते क्योंकि तुम पुरुषार्थी हो''

प्रश्न:- गृहस्थ में रहते कर्म अवश्य करना है लेकिन किस एक बात की सम्भाल जरूर रखनी है?
...
उत्तर:- कर्म करते, व्यवहार में आते अन्न की बहुत परहेज़ रखनी है। पतितों के हाथ का नहीं खाना है, अपने को बचाते रहना है। कर्म सन्यासी नहीं बनना है लेकिन परहेज़ जरूर रखनी है। तुम कर्मयोगी हो। कर्म करते बाप की याद में रहो तो विकर्म विनाश होंगे।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर ज्ञान और योगबल से माया पर विजय पानी है। विनाश के पहले अपने विकर्मों को विनाश करना है।
2) बेहद का राज्य लेने के लिए हर बात में अपना बचाव करते रहना है। अन्नदोष से बहुत सम्भाल करनी है।

वरदान:- दिल की समीपता द्वारा सहयोग का अधिकार प्राप्त कर उमंग-उत्साह में उड़ने वाले तीव्र पुरूषार्थी भव
जो बच्चे दूर बैठे भी सदा बाप की दिल के समीप हैं उन्हें सहयोग का अधिकार प्राप्त है और अन्त तक सहयोग मिलता रहेगा इसलिए इस अधिकार की स्मृति से कभी भी न तो कमजोर बनना, न दिलशिकस्त बनना, न पुरूषार्थ में साधारण पुरूषार्थी बनना। बाप कम्बाइन्ड है इसलिए सदा उमंग-उत्साह से तीव्र पुरूषार्थी बन आगे बढ़ते रहना। कमजोरी वा दिलशिकस्त-पन बाप के हवाले कर दो, अपने पास सिर्फ उमंग-उत्साह रखो।

स्लोगन:- श्रीमत के कदम पर कदम रखते चलो तो सम्पूर्णता की मंजिल समीप आ जायेगी।

Today Murli ( God's Word For Today ) - 05-12-12 English:

Today Murli ( God's Word For Today ) - 05-12-12 English:

Essence: Sweet children, you have received the third eye of knowledge. You have become trikaldarshi, but you cannot be given those ornaments at this time because you are effort-makers.

Question: While living at home with your family you definitely have to perform actions, but what one thing do you have to be very cautious about?
...
Answer: While performing actions and interacting with everyone, be very cautious about food. Don’t eat food prepared by impure human beings. Continue to protect yourselves. Don’t become renunciates of action, but definitely take precautions. You are karma yogis. While performing actions, stay in remembrance of the Father and your sins will be absolved.

Essence for dharna:
1. Conquer Maya with the power of knowledge and yoga by following shrimat. Have your sins absolved before destruction takes place.
2. In order to claim the unlimited kingdom, continue to protect yourself in every way. Be very cautious about being affected by the food you eat.

Blessing: May you be an intense effort-maker who flies with zeal and enthusiasm by having a right to co-operation through closeness of the heart.
The children who remain constantly close to the Father’s heart even while sitting far away receive a right to co-operation and they will continue to receive co-operation till the end. Therefore, with the awareness of this right, neither become weak or disheartened nor become an ordinary effort-maker in your efforts. The Father is combined with you and you must and therefore become an intense effort-maker with constant zeal and enthusiasm and continue to move forward. Hand over your weaknesses and disheartenment to the Father and just keep zeal and enthusiasm with yourself.

Slogan: Continue to place your footsteps in the steps of shrimat and the destination of perfection will come close.

Monday, December 3, 2012

Today Murli ( God's Word For Today ) - 04-12-12 Hindi:

★ Today Murli ( God's Word For Today ) - 04-12-12 Hindi:

मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - याद में बैठते समय आंखे खोलकर बैठो क्योंकि तुम्हें खाते-पीते, चलते-फिरते बाप की याद में रहना है''

प्रश्न:- भगवान को ढूँढने के लिए मनुष्य दर-दर धक्के क्यों खाते हैं - कारण?
...
उत्तर:- क्योंकि मनुष्यों ने भगवान को सर्वव्यापी कह बहुत धक्के खिलाये हैं। सर्वव्यापी है
तो कहाँ से मिलेगा? फिर कह देते हैं परमात्मा तो नाम-र
ूप से न्यारा है। जब नाम-रूप से ही न्यारा है तो मिलेगा फिर कैसे और ढूँढेंगे किसको? इसलिए दर-दर धक्के खाते रहते हैं। तुम बच्चों का भटकना अब छूट गया। तुम निश्चय से कहते हो-बाबा परमधाम से आये हैं। हम बच्चों से इन आरगन्स द्वारा बात कर रहे हैं। बाकी नाम-रूप से न्यारी कोई चीज़ होती नहीं।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर सबको पावन बनाने का रास्ता बताना है। पतित-पावन बाप का परिचय देने की युक्ति रचनी है।
2) बाप से वर्सा लेने के लिए वा बाप की शरण में आने के लिए पूरा-पूरा नष्टोमोहा बनना है। आंख खोलकर बाप को याद करने का अभ्यास करना है।

वरदान:- नॉलेजफुल बन व्यर्थ को समझने, मिटाने और परिवर्तन करने वाले नेचरल योगी भव
नेचरल योगी बनने के लिए मन और बुद्धि को व्यर्थ से बिल्कुल फ्री रखो। इसके लिए नॉलेजफुल के साथ-साथ पावरफुल बनो। भले नॉलेज के आधार पर समझते हो कि ये रांग है, ये राइट है, ये ऐसा है लेकिन अन्दर वह समाओ नहीं। ज्ञान अर्थात् समझ और समझदार उसको कहा जाता है जिसे समझना भी आता हो, मिटाना और परिवर्तन करना भी आता हो। तो जब व्यर्थ वृत्ति,
व्यर्थ वायब्रेशन स्वाहा करो तब कहेंगे नेचरल योगी।

स्लोगन:- व्यर्थ से बेपरवाह रहो, मर्यादाओं में नहीं।

Today Murli ( God's Word For Today ) - 04-12-12 English:

★ Today Murli ( God's Word For Today ) - 04-12-12 English:

Essence: Sweet children, when sitting in remembrance, sit with your eyes open because you have to stay in remembrance of the Mother and Father while eating, drinking, walking and moving around.

Question: What is the reason why people wander from door to door searching for God?
...
Answer: Because people have said that God is omnipresent and
made others wander around a great deal. If He were omnipresent, where would you find Him? They then say that He is beyond name and form. If He were beyond name and form, how would you find Him? For whom would you look? This is why they continue to wander from door to door. You children have now stopped wandering around. You say with faith that Baba has come from the supreme abode. He is speaking to us children through these organs. However, there is nothing that is beyond name and form.

Essence for dharna:
1. Follow shrimat and show everyone the path to become pure. Create yuktis to give the Purifier Father’s introduction.
2. In order to claim your inheritance from the Father and to take refuge with the Father, become one who has destroyed all attachment. Practise remembering the Father with your eyes open.

Blessing: May you be a natural yogi who understands, finishes and transforms waste by being knowledge-full.
In order to become a natural yogi, keep your mind and intellect completely free from all waste. For this, as well as being knowledge-full, also be powerful. Although, on the basis of knowledge, you understand whether someone is right or wrong and is as they are, do not keep that inside yourself. Knowledge means understanding and a sensible one is one who knows how to understand everything, how to finish everything and also how to transform everything. So, when you sacrifice any wasteful attitude and vibrations, you will be said to be a natural yogi.

Slogan: Remain unconcerned about all waste, not about the codes of conducts.